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कोरोना काल में सेवा कम सियासत के दाँव ज्यादा लगा रही है कांग्रेस


sonia-rahul
New Delhi:कुमार राकेश. भारत ही नहीं पूरा विश्व कोरोना के चपेट में हैं, दहशत में हैं, असमंजस में हैं. कशमकश में है, ऊहापोह की स्थिति में है. कोरोना का सच क्या है, झूठ क्या है. कोरोना के बाद क्या? आगे के क्या? इस वैश्वविक महामारी रूपी आतंक का इलाज क्या हैं. इस बीमारी की दवा क्या है? इस तरह के सैकड़ों के सवाल हैं. भारत के सामने. विश्व के सामने. कुछ इसी तरह के सवाल देश के अति प्राचीन पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस के लिए भी है. कोरोना और कांग्रेस की स्थिति एक जैसी लग रही है. कांग्रेस क्या करे, क्या न करे वाले मोड में दिख रही है. खाली-पीली राजनीति कर वाहवाही करवाने के कई तरह के बहाने ढूँढ रही है. ढूंढती रहती है. लेकिन होता कुछ भी नहीं. बातें बड़ी बड़ी. परिणाम कुछ भी नहीं. सचमुच कांग्रेस आल इंडिया कन्फ्यूज्ड पार्टी जैसी बन गयी लगती है. नेतृत्व किसका, नेता कौन. कुछ पता नहीं चल रहा है. सभी पुराने हथकंडे फेल और नई नौटंकी भी बेअसर. लगता है आम जनता कांग्रेस के जय घोष के नारे भूल गयी है. ऐसा क्यों? इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है. सिर्फ मोदी सरकार की खिचाई के अलावा कांग्रेस के पास कोई मुद्दा नहीं. वो भी बिना आधार के. हाँ कुछ मीडिया घरानों का साथ जरुर हैं. कांग्रेस के आरोपो में कुछ तथ्य कुछ हो या न हो. लेकिन मोदी सरकार को पानी पी पीकर सिर्फ कोसते रहना ही एक बड़ा काम हैं उनके लिए. कांग्रेस के लिए कोरोना एक सेवा भाव नहीं सियासत का नया दाँव दिख रहा है. अब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व चिर युवा नेता राहुल गाँधी को ही देखिये. प्रवासी मजदूरों के लिए उनके दिल में अपार प्यार है.उनके प्यार का अपना एक अलग नफासत भरा अंदाज़ है. स्टाइल है. नाज़ हैं. नखरे है. राहुल को दिल्ली ही पूरा देश लगता है. इसलिए दिल्ली में राहुल मीडिया भाव से कुछ प्रवासी मजदूरों से मिले. हाल चाल पूछा. कुछ मास्क. कुछ भोजन भी बांटे. फिर दिल्ली अध्यक्ष अनिल चौधरी ने उन मजदूरों को उत्तर प्रदेश के सीमा पर ले जाकर पूर्ववत छोड़ दिया.फिर वे सारे मजदूर जस के तस.बेचारे मजदूर राहुल के मीडिया भाव को समझ नहीं सके. पूरा मजदूर परिवार अवाक्. स्तब्ध. भ्रमित. पसोपेस में. सोचा था राहुल गाँधी ने मदद की है तो उनके घरों तक अपनी लम्बी गाड़ियों से छुड़वा ही देंगे. लेकिन हुआ कुछ नहीं. कुछ समझे आप. मीडिया में राहुल बाबा की जय हो गयी. वास्तव में उनकी नीयत सेवा की नहीं सियासत की थी. वो पूरी हो गयी. राहुल गाँधी सचमुच में महान हैं, उनकी महानता ऐतिहासिक हैं राहुल गाँधी सचमुच में महान हैं. उनकी महानता ऐतिहासिक हैं. उन्हें दिल्ली के कुछ प्रवासी मजदूर तो याद आ गए, लेकिन राहुल जी को औरंगाबाद की रेल पटरियों पर भूख से मारे गए उन मजदूरों के शोक संतप्त परिवार याद नहीं आये.उन परिवारों के लिए कुछ भी नहीं.कोई ब्यान नहीं. कोई बाइट नहीं. बस एक चुप्पी. ये कैसी नौटंकी. किस लिए.क्यों नहीं? क्योकि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है. वो सरकार जो कोरोना की लड़ाई में सबसे फेल सरकार रही. प्रभावहीन सरकार रही. मरकज़ तबलीगी जमातियों की हिमायत वाली सरकार. यदि महाराष्ट्र के कोरोना स्थिति की किसी ईमानदार एजेंसी से जांच करवाई जाये तो कई रहस्यपूर्ण तथ्य सबके सामने आ सकते हैं. महाराष्ट्र के अलावा राजस्थान की हालत भी चिंता जनक है. छतीसगढ़ भी डावाडोल है. परन्तु राहुल जी को कोई चिंता नहीं. क्या सत्ता ही सेवा है कांग्रेस के लिए,आम जनता कुछ भी नहीं. क्या कांग्रेस सत्ता बिना सेवा नहीं कर सकती? ऐसा क्यों राहुल जी? हम कांग्रेस की पुरानी बातों पर चर्चा नहीं करेंगे. बड़ी लम्बी फेहरिस्त है. फिर से नए व बड़े विवाद पैदा हो सकते है. ये समय उसके लिए नहीं है, क्योंकि प्रवासी मजदूरों व कोरोना प्रभावितों का काम पीछे हो जायेगा. कांग्रेस के सत्ता काल में राहत कार्यों पर कई उपन्यास बन जायेंगे-राहत कार्यों में घोटालो का, गड़बड़ियों का. पक्षपात का. सेवा के नाम पर कांग्रेसी नेताओ का घर भरने का. अब कांग्रेस के कोरोना काल में सेवा भाव का ही रिकार्ड देख ले. कुछ खास नहीं. कांग्रेस संगठन स्तर पर अबतक कितने प्रवासी मजदूरों या कोरोना प्रभावित परिवारों का भला किया, कुछ क्या किया? हाँ, राहुल गाँधी की बहन व कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने प्रवासी मजदूरों के लिए राहुल से अलग कुछ बेहतर करने की कोशिशें जरुर की. एक हज़ार बसों की व्यवस्था की. उसे फिर मुद्दा बनाया. फिर सियासत के नए दाँव. नए तिकड़म तथाकथित सेवा भाव के. अब भी ज़िद पर दिख रही है. वो भी बसों के कुछ गलत आंकड़ों के साथ. उन बसों की तथाकथित सूची को देखकर लालू यादव के चारा घोटाले की यादे ताज़ा हो गयी.लालू यादव ने स्कूटर और साइकिल पर बैल गाड़ी व चारा को ढोया था,अब प्रियंका वाड्रा तो बसों की सूची में 460 की संख्या में स्कूटर,औटो और ट्रकों को बसें बता कर प्रवासी मजदूरों की सेवा करने की जिद्द पर अड़ गयी थी. है न रोचक बात! कांग्रेस का दावा था कि वो बसें पार्टी की है,जो उनकी नहीं थी, वो थी ज्यादातर राजस्थान सरकार की.वाह री राजनीति. कमाल है कांग्रेस का और उनकी पुरानी चिर परिचित शैली का. माल सरकार का, कमाल व धमाल पार्टी का. इस झूठ से पर्दा उठाया उत्तर प्रदेश के योगी सरकार ने. जब झूठ सबके सामने आया. तो बाते फिर बदल दी गयी. एक तो उनकी पार्टी की विधायक अदिति सिंह ने भी उस झूठ पर टिपण्णी की तो उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया.ये कांग्रेस की सियासत व उसके नए नए दांव.वो भी कोरोना प्रभावितों व प्रवासी मजदूरों के नाम पर.ऐसा क्यों? क्या पार्टी को शर्म भी नहीं आती? कांग्रेस के सभी सियासती दाँव फेल हो गए कांग्रेस ने मोदी सरकार के आरोग्य सेतु पर सवाल उठाया. नहीं जमा. अस्पतालों की स्थितियों पर सवाल उठाया. वो भी नहीं चला. PMCARES फंड पर भी सवाल उठाया गया. गरीबों को मदद में कमी की बात प्रचारित की गयी. पर कांग्रेस के सभी सियासती दाँव फेल हो गए. वे सारे आरोप यूपी के बसों की तरह झूठे निकले. फिर कांग्रेस चुप. उसके बाद कांग्रेस फिर से नए मुद्दे की तलाश में. क्या विपक्ष की रचनात्मक भूमिका यही होती है? कांग्रेस सिसक रही है.घुट रही है. तड़प रही है .कांग्रेस की आंतरिक स्थिति बीमार सी हो गयी है. क्या हो गया इस सोनिया कांग्रेस को. कांग्रेस 1998 के पहले ऐसी नहीं थी,अब क्यों ऐसी गैर जिम्मेदार हो गयी.कांग्रेस का चेहरा,चरित्र और चाल बदल गया सा लगता है. बिलकुल बदल गया है. समाज सेवा के लिए सत्ता भाव नहीं, निष्काम भाव की जरुरत होती है जो कांग्रेस में समाप्त हो गयी है. प्रहसन, हंसी, ठिठोली, व्यंग्य बाण, झूठ की मदद से सत्य को बहलाने से राजनीति नहीं होती है.राजनीति होती है जरूरतमंद की सच्ची सेवा से. निष्काम सेवा से, जो कि मोदी सरकार निष्काम भाव से कर रही है. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता की माने तो उनका कहना है, पता नहीं पार्टी में सबकुछ उल्टा-पुल्टा क्यों हो रहा है? कांग्रेस के पास प्रवासी मजदूरों के कल्याण के लिए कोई ठोस नीति नहीं कांग्रेस के पास प्रवासी मजदूरों के कल्याण के लिए कोई ठोस नीति है नहीं. हो भी कैसे, भारत के कामगार समाज पर कहर तो उनकी सरकार ने ही शुरू किया था.वर्ष 1991 की कांग्रेस सरकार ने विश्व उदारीकरण के नाम पर भारत में संगठित मजदूरों को तोड़ना शुरू किया, जो आज तक जारी है. जब संगठित मजदूरों को ही तितर –बितर करना नीयत में शामिल हो तो असंगठित कामगारों का क्या? यदि आप आज भी प्रवासी मजदूरों का सही आंकड़ा पता करने की कोशिश करेंगे तो सही आंकड़ा बिलकुल नहीं मिलेगा. मैंने भी इस मसले पर छोटा सा शोध करने की कई कोशिशें की. पूरी सफलता नहीं मिल सकी. हाँ संयुक्त राष्ट्र का एक आंकड़ा मिला. उस आंकड़े में भारत में प्रवासी और घुमंतू मजदूरों व कामगारों की संख्या करीब 40 करोड़ बताई गयी है. वो कितना सही है या गलत,इस पर भारत सरकार का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं. शायद ऐसे घालमेल के मद्देनजर ही देश में पहली बार मोदी सरकार ने प्रवासी मजदूरों के समग्र कल्याण के लिए एक अनुपम योजना की घोषणा की है.जो परस्पर सियासत की खोखले हंगामे के बीच गुम सी हो गयी लगती है. मोदी सरकार ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है वे सब अपने अपने राज्यों से प्रवासी मजदूरों का सही आंकड़ा पूरे विवरण के साथ केद्र को भेजे. उन विवरणों के साथ अलग डाटा बैंक बनाया जा जायेगा. उसके एक अलग से एक वेबसाइट भी तैयार करने की पूरी योजना तैयार कर ली गयी है. संभवतः आज़ादी के बाद ये पहली बार किसी सरकार ने ये कदम उठाया है. यह कदम प्रवासी मजदूरों के सम्पूर्ण दर्द निवारण व समग्र कल्याण के तहत ये एक अहम दस्तावेज़ होगा.गौरतलब है कि प्रवासी मजदूरों की भयावह स्थिति ने मोदी सरकार के साथ साथ कई राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा किया है. वैसे तो राज्य सरकारें इस अफरा तफरी स्थिति के लिए अपने अपने जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते. राज्य सरकारों की बचने की कोशिशें जारी हैं. जिसके लिए खासकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी सहित पूरा परिवार व पार्टी पूरी ताक़त लगा रहे हैं. पर ऐसा लगता है कि कांग्रेस अब कुछ भी कर ले, पार्टी का होना वही है, जो विधाता ने लिख रखा हैं. आम जनता तो बेचारी थी, शायद वो बेचारी ही रहेगी.यदि मोदी सरकार ने भी उन घोषित कदमो ओ पूरी तरह लागू नहीं किया. 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