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पालघर में संतों का संहार: एक गहरी साजिश


New Delhi:

डॉ विजय सोनकर शास्त्री  : महाराष्ट्र के पालघर में गत 16 अप्रैल की रात दो साधू महाराज कल्पवृक्षगिरि महाराज (70), सुशीलगिरि महाराज (35) अपने ड्राइवर निलेश तेलगड़े के साथ एक परिचित के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मुंबई से सूरत जा रहे थे। गुजरात सीमा के पास पालघर जिला स्थित दहानु तालुका के एक आदिवासी बाहुल्य गडचिंचले गांव में उनकी कार को रोक लिया गया। फिर उग्र भीड़ ने उन सभी की पुलिस के सामने पीट-पीटकर हत्या कर दी। महाराष्ट्र पुलिस खड़ी होकर सामुहिक नरसंहार को देखती रही। यह पूरी घटना जिस तरह से घटी, उसमें महाराष्ट्र की शिवसेना की सरकार तथा स्थानीय पुलिसकर्मियों के ऊपर भी कई गंभीर सवाल पैदा हो गए क्योंकि घटना के समय पुलिसकर्मी मौके पर ही थे, पर उन्होंने दोनों साधुओं को बचाने की जगह, उन्हें उग्र भीड़ को सौंप दिया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने जहां इस सामुहिक नरसंहार को ग़लतफ़हमी में हुई लिंचिंग की घटना बताया, वही राज्य के मुख्यमंत्री अनिल देखमुख ने भी घटना को लेकर भाजपा एवं अन्य दलों पर राजनीति करने का आरोप लगाकर अपना पल्ला झाड़ लिया I अनिल देशमुख ने घटना के आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा करते हुए कहा कि इस मामले में मुस्लिम संप्रदाय का कोई भी व्यक्ति शामिल नहीं था। प्रश्न यह है कि उन्हें सफाई में मुसलमान नहीं है, यह क्यों कहना पड़ा?

जूना अखाड़े से जुड़े दोनों साधुओं की निर्मम हत्या से कई सवाल पैदा हुए हैं, जिनमें मुख्य प्रश्न यह है कि साधुओं की बर्बर हत्या का जिम्मेदार कौन? यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि संतों की हत्या जिस क्षेत्र में हुई, वह पूरा क्षेत्र ईसाई मिशनरियों का एक बड़ा केंद्र होने के साथ ही वामपंथी दलों के प्रभाव वाला क्षेत्र है। संतों की हत्या के जो वीडियो सामने आए, उसमें स्थानीय वामपंथी नेताओं को भी मौके पर देखा गया। वर्षों से स्थानीय आदिवासियों को छद्म रूप में सेवा एवं धन के लालच को हथियार बनाकर धर्म परिवर्तन कराने की साजिशें लगातार चल रही हैंI यहां पर ईसाई मिशनरियों, वामपंथियों एवं कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिमों के गठजोड़ को भी बडे बारीकी से समझने की आवश्यकता है। साथ ही यह ज्ञात करना भी आवश्यक है कि ईसाई मिशनरियों, वामपंथियों एवं कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिमों का यह अघोषित गठबंधन किस प्रकार से हिन्दू धर्मावलम्बियों को निशाना बनाकर हिन्दू समाज को तोड़ने का खेल खेलता आ रहा है। इनकी जड़ें बहुत गहरी तो है ही, साथ ही हिन्दू समाज को तोड़ने के कुचक्र का षड़यंत्र भी लगभग दो शताब्दि से लगातार सुनियोजित रूप से चलता आ रहा है I

हिन्दू समाज निशाने पर कैसे एवं कब से

भारत में विदेशी आक्रांता मुस्लिम आक्रमणकारियों ने जब हिन्दुस्तान को बलपूर्वक अपने कब्ज़े में करके सत्ता को हथियाया तो उनके निशाने पर हिन्दू समाज ही रहा। हिन्दुओं को भय और बलपूर्वक इस तरह से दबाव बनाया गया कि वे हिन्दू धर्म को छोड़कर इस्लाम को अपनाने के लिए बाध्य हो गए। लगभग छह सौ साल तक जारी इस प्रक्रिया के दौरान जिन हिन्दुओं ने धर्म परिवर्तन नहीं किया, उन्हें अस्वच्छ कार्यों को करने के लिए बाध्य किया गया। तत्कालीन हिन्दुस्तान में मैला ढ़ोने एवं चर्म कर्म का विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है। हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी को बलपूर्वक दमन एवं दलन के उपरांत अस्वच्छ कार्य करने के लिए मजबूर करके उन्हें दलित बना दिया गया। इस प्रकार भारत में दलित समाज की उत्पत्ति हुई, जिसका भी चालाकी से दोष हिन्दू समाज पर ही मढ़ दिया गया। लगभग छह सदी तक हिन्दू धर्मावलम्बियों को बलपूर्वक दलित बनाने का क्रम चलता रहा। इसके उपरांत विदेशी आक्रांताओं के प्रयास और अपनों के घृणा के कारण वे बिलग होकर दलित वर्ग के रूप में चिन्हित हुए।

16वी सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आयी और व्यापार करने के साथ ही भारत की भूमि पर अपना कब्ज़ा जमाना शुरू किया। इसके उपरांत भी यह वह समय भी था, जब भारत मध्ययुगीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में पूरे विश्व में देखा जाता था। ईस्ट इंडिया कंपनी भी भारत की आर्थिक स्थित को देखकर यहां पहुंची थी। आर्थिक इतिहासकार अंगस मैडीसन की पुस्तक ‘द वर्ल्ड इकॉनमी: ए मिलेनियल पर्स्पेक्टिव (विश्व अर्थव्यवस्था: एक हज़ार वर्ष का परिप्रेक्ष्य)’ के अनुसार 17वीं सदी तक भारत विश्व का सबसे धनी देश और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था था। इसलिए भारत की आर्थिक स्थिति को पूरा लाभ उठाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के साथ ही भारत की सत्ता पर भी कब्ज़ा करना प्रारंभ किया।

तत्कालीन समय में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने हिन्दू समाज के उस विराट स्वरुप को भी भलीभांति देखा और महसूस किया, जिस विराट स्वरूप के कारण हिन्दू जनता मुस्लिक शासकों की गुलामी करने के उपरांत भी अपने धर्म, आस्था और विश्वास पर अडिग और संगठित थी। हिन्दू समाज अपनी आस्था, विश्वास, रीतिरिवाज, परंपरा, यम-नियम, धर्माधिकार, मानवाधिकार और एक विशिष्ट जीवन पद्धति के लिए जाना जाता था। किन्तु भारत की संवृद्धि पूर्वकाल में सबसे पहले विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं और बाद में अंग्रेजों के दुराग्रहों की भेंट चढ़ी।

अंग्रेजों ने शुरू किया साजिशों का खेल

लगभग एक सदी तक भारत में रहने और भारत की जनता के मनोविज्ञान को समझने के उपरांत ब्रिटिश सरकार की सत्ता स्थापित करने हेतु यहाँ के सामाजिक ताने-बाने में विदेशी आक्रांताओं के कूशासन के कारण व्याप्त कमियों का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने कुछ चालें चलीं। उस समय ब्रिटिश संसद ने एक निर्णय लिया कि भारत में हिन्दुओं के हित के लिए उनके धर्म ग्रंथों का प्रकाशन किया जाय। वे भारत की हिन्दू जनता को अपने चंगुल में फंसाकर उन्हें उच्च-निम्न जातियों में बांटकर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते थे। और इसी लिए सबसे पहला निशाना मनुस्मृति को बनाया गया। 1794 में सर विलियम जोन्स नामक एक अंग्रेज ने मनुस्मृति का अंग्रेजी भाषा में अपने ढंग से अनुवाद किया था और बाद में उसी के आधार पर ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने भारत में हिन्दू जनता के लिए कानून बनाये। धर्म ग्रंथों के प्रकाशन के निर्णय के बाद सर्वप्रथम रामायण, रामचरित मानस, श्रीमद्भागवत, या भागवत गीता को न छापकर मनुस्मृति को छापने का निर्णय लिया। 1828 में अंग्रेजों ने मनुस्मृति में प्रक्षिप्तता करके उसके संपादन एवं प्रकाशन का कार्य भी किया। मनुस्मृति में विवादित तथ्यों को जोड़कर अंग्रेजों ने उसका उपयोग अपने हितों को साधने और हिन्दू धर्म को बांटने के लिए किया। उसके उपरांत अंग्रेजों ने भारत की प्रचीन शिक्षा पद्धति को निशाना बनाया, जो शिक्षा पद्धति हिन्दू धर्म की नींव थी और नगरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों पाठशालाओं के माध्यम से सबको शिक्षित करने का कार्य कर रहे थे। अंग्रेजों का उद्देश्य था कि गुरुकुल और पाठशालाओं की शिक्षा प्रणाली को यदि नष्ट कर दिया जायेगा तो हिन्दू समाज को तोड़ने में सरलता होगी I

भारत की संस्कृत आधारित शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस करते हुए 1834 में लार्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले ने जिस नयी शिक्षा प्रणाली को प्रारम्भ करने की घोषणा की, वह शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से अंग्रेजी हितों को साधने की दृष्टि से तो थी ही, साथ ही उस प्रणाली ने भारत की उस प्राचीन एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का काम भी किया, जो भारत की जड़ों को मजबूत करने का काम कर रही थी। नयी शिक्षा प्रणाली के आधार पर प्रारंभ हुई शिक्षा ने देखते-देखते ही जहां नब्बे प्रतिशत भारतीयों को शिक्षा से दूर करने का काम किया, वही भारत के अंदर जानबूझकर एक ऐसे आभिजात्य वर्ग को उत्पन्न किया, जिसने भेदभाव और सामाजिक असमानता को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई।

भारत के जंगलों एवं दुर्गम स्थानों पर भारी विरोध के कारण जब अंग्रेज शासन नहीं कर पाये तो सेवा के बहाने ईसाई मिशनरियां वहां घुसकर धर्मांतरण का नंगा नाच प्रारंभ किये। ईसाई मिशनरियों को उन मुस्लिम शासकों का भी सहयोग मिला, जो भारत में हिन्दुओं को डरा-धमकाकर धर्मपरिवर्तन के लिए बाध्य करते आ रहे थे। इसी मध्य सुनियोजित तरीके से अंग्रेजों ने अपनी सेना एवं प्रशासन में उन हिन्दुओं को शामिल करना प्रारम्भ कर दिये थे, जिन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के दबाव में अस्वच्छ कार्य स्वीकार कर लिया, किन्तु धर्म परिवर्तन को ठुकरा दिया। एक तरह से तथाकथित दलितों के समक्ष घड़ियाल आशू बहाने का काम किये थे। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने अस्वच्छ तथा निम्न कर्म करने वाली जातियों को जिन्हें अंग्रेजों ने 1931में डिप्रेस्ड क्लास और डॉ भीम राव आंबेडकर ने दलित का नाम दिया था, को हिन्दू धर्म से पूरी तरह अलग करने के लिए जिस तरह से कदम उठाया, उसका खुलासा बाद में डॉ आंबेडकर ने भी कियाI 1857 की क्रांति के बाद ईसाई मिशनरियां और तेजी से सक्रिय हुई और सुनियोजित ढंग से भारत में जाति आधारित विघटन की दिशा में एकजुट होकर काम करने लगी।

1891 में डॉ आंबेडकर के जन्म से भी लगभग बीस वर्ष पहले प्रोफ़ेसर एम ए शेरींग ने ‘हिन्दू ट्राइब्स एंड कास्ट’ के नाम से एक पुस्तक लिखी थी, उस पुस्तक में दलितों को हिन्दू धर्म के प्रति भड़काने के साथ ही ईसाई धर्म अपनाने का आह्वान किया गया था। 1872 में लिखी गयी इस पुस्तक को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि भारत में अंग्रेजों और उनकी सहयोगी ईसाई मिशनरियों ने जिस तरह से जाति प्रथा का कुप्रचार किया, उसका परिणाम हिन्दू धर्म में हुई विघटन की प्रक्रिया के रूप में सामने आया। इनके निशाने पर दलित जातियां तो थी ही, विशेषकर हिन्दू धर्म का वह बड़ा वर्ग था, जो तथाकथित चर्मकार जाति से थी।

यहाँ ध्यान देने योग्य बिंदु यह भी है कि डॉ आंबेडकर के पिता और दादा जब शिक्षित थे तो फिर डॉ आंबेडकर को शिक्षा ग्रहण करने में कठिनाइयां क्यों आयी ? डॉ आंबेडकर का जब जन्म हुआ तो उसके पहले ही अंग्रेजों द्वारा भारत में जातिभेद या जाति विभाजन की प्रक्रिया बहुत तीब्र गति के साथ समाज में पैदा की जा चुकी थी, जिसका प्रतिकार करने का काम ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों द्वारा किया जा रहा था। लेकिन लार्ड मैकाले की नयी शिक्षा प्रणाली ने शिक्षा के सुधार के नाम पर शिक्षा के व्यवसायीकरण को जिस तरह से बढ़ावा दिया गया, उसका परिणाम यह निकला कि 1935 में जहां 90 प्रतिशत तक शिक्षित होने वाले हिन्दू समाज से शिक्षा बहुत दूर होती चली गयी। धर्मपाल जी की पुस्तक ‘ब्युटीफूल ट्री’ में प्रमाणों के साथ विस्तृत विवरण इस विषय में पढ़ा जा सकता है। नयी शिक्षा प्रणाली ने हिन्दू समाज को शिक्षा से दूर करने का काम किया और शिक्षा सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त लोगों के बीच ही सिमट कर रह गयी I

अंग्रेजों की नीतियां और ईसाई मिशनरियों के रणनीति के बीच 1920 में प्रोफ़ेसर डब्लू एस विग्रस ने ” दी चमार्स” नाम से एक पुस्तक लिखी और पुस्तक के माध्यम से चर्मकार जाति को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। यहां प्रश्न यह भी है कि अंग्रेजों के अनुसार उस वक्त भारत में विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं के उत्पीडन, अत्याचार, व्याभिचार, दमन और दलन के कारण मटर के दाने की तरह बनकर बिखरी हुई लगभग 6500 जातियां एवं पचास हजार से अधिक उपजातियां थी तो केवल चर्मकार जाति पर ही पुस्तक क्यों लिखी गयी थी ? इस पुस्तक का अध्ययन डॉ आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनके मन में कभी भी ईसाई धर्म अपनाने की इच्छा नहीं उत्पन्न हुई I

ईसाई मिशनरियां, मुस्लिम और वामपंथी

भारत में हिन्दू धर्म को तोड़ने की साजिश में ईसाई मिशनरियां, मुस्लिम और वामपंथी तीनों ही एकजुट होकर वर्षों से काम करते आ रहे हैं I अंग्रेजी शासनकाल से लेकर स्वतन्त्र भारत में इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने में वामपंथियों का सबसे बड़ा हाथ रहा। इतिहास के माध्यम से हिन्दू धर्म पर लगातार प्रश्न खड़े किये गए और हिन्दू धर्मावलम्बियों को मुस्लिम या ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। हिन्दू धर्म में दलित जाति नामक नए वर्ग को भी साजिश के तहत बनाकर उन्हें हिन्दू समाज से अलग-थलग करके योजनाबद्ध तरीके से उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाया गया।

ईसाई मिशनरियां, कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम और वामपंथी शहरी नक्सलीयों द्वारा हिन्दू धर्म को तोड़ने की साजिशों को स्वामी श्रद्धानंद ने बखूबी समझा था और फिर तब उन्होंने शुद्धि आंदोलन शुरू कर दिया था। 1920 के दशक में शुद्धि आन्दोलन का मूल लक्ष्य धर्म परिवर्तन करने वाले हिन्दुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाना था। डॉ आंबेडकर ने 1922 में कहा था कि स्वामी श्रद्धानन्द अछूतों के “महानतम और सबसे सच्चे हितैषी” हैं। यह आंदोलन जब अपनी चरम अवस्था में था, तब एक कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम युवक ने स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या कर दी। यह हत्या कांड महात्मा गाँधी के हत्या जैसा ही था। यहां यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि स्वतंत्रता से पहले हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए ईसाई मिशनरियां और मुस्लिम लीग एकजुट होकर काम कर रहे थे तो स्वतंत्रता के बाद वामपंथी भी इसमें शामिल हो गए। भारत में जारी धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया का एक अन्य परिणाम उड़ीसा में हिन्दू स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और अब पालघर में कल्पवृक्षगिरि एवं सुशीलगिरि महाराज की निर्मम हत्या के रूप में देखा जा सकता है I

धर्मपरिवर्तन गिरोह की रणनीति

यह एक आश्चर्य का विषय है कि मुस्लिम राष्ट्रों में ईसाई धर्म के लोगों को हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और उनको वहां बहुत ही सीमित अधिकार पर ही मुस्लिम देश में रहने का आदेश मिलता है। इसके विपरीत भारत में ईसाई और मुस्लिम, दोनों मिलकर वर्षों से काम करते आ रहे हैं। कुछ ईसाई और मुस्लिम पंथ के मानने वाले भारत एवं हिन्दू विरोधी गतिविधियों में वामपंथीयों को अपना पूरा समर्थन देते आ रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के बाद से ईसाई और मुस्लिम धर्म के प्रचारक भारत के कोने-कोने तक जा पहुंचे है और उनके निशाने पर दलित वर्ग सबसे अधिक है।

दलितों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए जय भीम-जय मीम जैसे छद्म नारों का सहारा लिया जा रहा हैI साथ ही इस काम में गैर सरकारी संगठन और ऐसे ईसाई भी तेजी से सक्रिय हैं, जिन्होंने अपना धर्म तो बदल लिया पर सार्वजनिक रूप से वह स्वयं को हिन्दू के रूप में प्रदर्शित करते हैं। ऐसे लोगों को क्रिप्टो (छिपे हुए) क्रिस्टियन या क्रिप्टो (छिपे हुए) मुस्लिम का नाम दिया गया है। इन सबकी सहायता हेतु वामपंथी नेता, कार्यकर्ता एवं वामपंथी संगठन भी सक्रिय होकर लगातार काम करते आ रहे हैं। दलितों से लेकर आदिवासियों के मध्य धर्मपरिवर्तन के इस खेल को कही सेवा कार्य के माध्यम से तो कहीं हिन्दू धर्म के प्रति घृणा भाव को पैदा करके और तो कहीं पर हिंदूवादी संगठनों के विरुद्ध दुष्प्रचार के रूप में किया जा रहा है I

मोदी सरकार बनते ही सभी विरोधी हुए एकजुट

2014 में मोदी सरकार बनाने के बाद भाजपा विरोधियों विशेषकर वामपंथियों के निशाने पर हिन्दू धर्म के साथ ही वह सभी हैं, जो हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही हिन्दू समाज में जागृति पैदा करने का काम वर्षों से करते आ रहे हैं। ईसाई मिशनरियां, कट्टरपंथी-जेहादी मुस्लिम और शहरी नक्सल वामपंथी अब तीनों एकजुट होकर हिन्दू धर्म, हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के महापुरुषों, साधु, संन्तो के प्रति घृणा भाव उत्पन्न करने में तिब्रता से जुटे हुए हैं। भीमकोरे गांव में हिंसा के बाद शहरी क्षेत्र में रहने वाले ऐसे पढ़े-लिखे नक्सली सामने आए हैं, जो किसी भी तरह मोदी सरकार को गिराने से लेकर हिन्दू नेताओं की हत्या ही नहीं अपितु मोदी जी के हत्या की साजिश करने में पीछे नहीं हैं। यह सभी संघठित रूप से अपने प्रभावशाली तंत्र के माध्यम से जनता को भ्रमित करने का काम कर रहे हैं और इसके प्रमाण कई बार सामने भी आ चुके हैं। इन सभी का मकसद भारत को खंड-खंड करके अपने स्वार्थो और हितों को पूरा करना है। कश्मीर से लेकर केरल तक पूरा एक तंत्र इनकी मदद कर रहा है। इनमें राजनेता से लेकर अपराधी गिरोह तक शामिल हैं I

पाल घर में संतों की हत्या का प्रकरण यह खुलासा भी करता है कि आदिवासी क्षेत्र में रहने वाली भोली-भाली जनता के मध्य तथाकथित वामपंथी, ईसाई और मुस्लिम संस्थाए अपने-अपने ढंग से धर्म परिवर्तन करने के लिए काम कर रही हैं और उनकी गतिविधियों का विरोध करने वाले की हत्या कर देना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है I दलित समाज को भड़काने के लिए डॉ आंबेडकर का सहारा लिया जा रहा है और अनपढ़ लोगों के मध्य डॉ आंबेडकर की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है, जिससे वह धर्म परिवर्तन करके हिन्दू धर्म को त्यागने के लिए आगे आ जाए। वामपंथी विचारधारा का शहरी नक्सली आयुष्मान आनंद तलन्तुवडे जो महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव से लेकर देश-विदेश तक घुमकर लोगों को भ्रमित करने में लगा है, उसे उसी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। कुछ मूर्ख दलित नेता उसके बारे में कहतें हैं कि वह डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर के पोती से विवाह किया है। यदि ऐसा है तो बाबा साहेब के वंशजों को वामपंथीयों के गोद में बैठने के बजाय यह स्मरण कराना चाहिए कि डॉ अंबेडकर वामपंथीयों को घृणा करते थे। वैसे वामपंथी कम्यूनिस्टों की इतनी दयनीय हालत है कि वे अब अपनेआकावों मार्क्स और लेनिन का नहीं बल्कि डॉ अंबेडकर के पोस्टर को लेकर धरना और प्रदर्शन करते दिखाई पडते हैं।

बहरहाल यह घटना प्रेरित करती है कि भारत और हिन्दू धर्म को कट्टरपंथी-जेहादी मानसिकता के मुस्लिम तबलीगी मरकजों, सेवा के बहाने धर्म परिवर्तन कराने वाले क्रिश्चियन मिशनरीयों और गरीब अपढ़ लोगों को बहकाकर सत्ता का सपना देख रहे वामपंथीयों की देश विरोधी प्रवृत्ति को अब रोका जाए। साथ ही भारत की काली-रात्रि वाले उस इतिहास को जनता के सामने रखा जाए जो भारत का वास्तविक इतिहास है। साथ ही हिन्दू धर्म को तोड़ने अथवा धर्म परिवर्तन के जो प्रयास चल रहें हैं, उन्हें रोकने के लिए कठोर कदमों को उठाने के साथ ही सामान्य जनता को भी इसके विरुद्ध खड़ा होने के लिए जागृत किया जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह संकट लगातार बढ़ता रहेगा और इसका नकारात्मक परिणाम हिन्दू धर्म और भारत को भी भुगतना पड़ेगा..

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